हिंदू परंपरा में विवाह को केवल सात फेरों की रस्म नहीं माना गया, बल्कि उसे हड्डी से हड्डी और माँस से माँस का मिलन कहा गया। यह परिभाषा विवाह को एक पवित्र, स्थायी और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा संस्कार बनाती थी। परंतु समय के साथ विवाह की आत्मा कमजोर हुई है। आज की शादी प्रेम से अधिक समझ, धैर्य और रोज़-रोज़ की परीक्षा बन चुकी है। एक ऐसा सतत इम्तिहान, जिसमें पति–पत्नी को हर दिन अपनी संवेदनशीलता, विवेक और संवाद-कौशल से सफल होना पड़ता है।
यदि यह परीक्षा असफल होती है, तो समाज में बैठे वे लोग, जो पढ़े-लिखे तो हैं, पर निष्पक्ष नहीं है, अपने स्वार्थ के कारण पति–पत्नी के बीच बेचैनी बढ़ा देते हैं। आज का समाज ऐसे असंख्य उदाहरणों से भरा पड़ा है।
यह सत्य है कि जहाँ प्रेम है, वहाँ मतभेद भी होंगे। समस्या मतभेद नहीं है, समस्या है, मतभेदों को संभालने की क्षमता का अभाव। यहीं से डिस्प्यूट ईटर अभियान की आवश्यकता जन्म लेती है।
हर झगड़ा तलाक़ की वजह नहीं होता। अधिकांश वैवाहिक विवाद एक तयशुदा क्रम से आगे बढ़ते हैं। पहले गलतफ़हमियाँ जन्म लेती हैं, फिर शक पनपता है, उसके बाद ग़ुस्सा बारूद की तरह जमा होने लगता है। अंततः मोबाइल, पैसा और परिवार जैसे तात्कालिक मुद्दे सलाई की तीली का काम करते हैं, और एक छोटा-सा विवाद विकराल रूप ले लेता है। पति-पत्नी की विवाद में चुप्पी भी बहुत घातक होता है।
डिस्प्यूट ईटर अभियान की दृष्टि में सबसे बड़ा खतरा यही है कि घरेलू स्तर पर सुलझ सकने वाला विवाद सीधे कोर्ट तक पहुँच जाता है।
कोर्ट की चौखट पर पहुँचते ही विवाद का स्वरूप बदल जाता है। पक्षकारों की भाषा कठोर हो जाती है, वकीलों की शब्दावली अलग हो जाती है, ग़ुस्सा क़ानून का रूप ले लेता है, और कभी-कभी क़ानून ही हथियार बन जाता है। न्यायालय ही रणभूमि बन जाता है, वकील अपने-अपने पक्षकारों के वज़ीर बन जाते है और घर वापसी के रास्ते धीरे-धीरे बंद हो जाते हैं।
डिस्प्यूट ईटर अभियान का मूल सिद्धांत है। “पहले बात को समझो, फ़ैसला बाद में करो।” डिस्प्यूट ईटर पति–पत्नी में से किसी एक को सही या ग़लत घोषित नहीं करता। वह दोनों की बात अलग-अलग भी सुनता है और साथ-साथ भी। वह आरोप नहीं, कारण खोजता है; अहंकार नहीं, समाधान पर काम करता है। डिस्प्यूट ईटर वही निष्पक्ष और संवेदनशील व्यक्ति होता है, जो यह कहने का साहस रखता है, “कोर्ट का दरवाज़ा खुला है, लेकिन पहले दिल का दरवाज़ा खोलकर देखो।”
पति–पत्नी की लड़ाई में सबसे गहरी और स्थायी चोट बच्चों को लगती है। डिस्प्यूट ईटर यह भली-भाँति समझता है कि बच्चे किसी के पक्ष में नहीं होते—वे सिर्फ़ शांति चाहते हैं। एक बचा हुआ रिश्ता केवल पति–पत्नी को नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी बचा लेता है।
जब बातचीत बंद हो जाए, जब शक हावी हो जाए, जब परिवार हस्तक्षेप करने लगे, और जब तलाक़ शब्द माँ मे बार-बार आने लगे, तब न्यायालय जाने से पहले डिस्प्यूट-ईटर के पास जरूर जाना चाहिए। क्योंकि इस मोड़ पर पति–पत्नी को सबसे पहले वकील नहीं, बल्कि एक समझदार, निष्पक्ष और मानवीय मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है।
डिस्प्यूट ईटर अभियान का उद्देश्य केवल रिश्ते बचाना नहीं है।
यह अभियान संवाद को पुनर्जीवित करता है, ग़ुस्से को समझ में बदलता है, अहंकार को समाधान में परिवर्तित करने का भरपूर प्रयास करता है और यदि रिश्ता बच न सके, तो उसे सम्मान, मर्यादा और शांति के साथ समाप्त कराने का मार्ग दिखाता है
इसीलिए हर पति–पत्नी को डिस्प्यूट ईटर को जानना चाहिए, लड़ने के लिए नहीं, रिश्ता बचाने के लिए। विशेष रूप से पढ़े-लिखे दम्पत्तियों को, जिनसे समाज अपेक्षा करता है कि वे विवाद बढ़ाने के बजाय समाधान की मिसाल बनें। शिक्षा तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग विवाद सुलझाने में हो। लेकिन जब वही शिक्षा विवाद बढ़ाने का औज़ार बन जाए, तो वह शिक्षा रिश्तों और समाज—दोनों के लिए घातक बन जाती है। डिस्प्यूट ईटर अभियान उसी शिक्षा को संवेदना से, और उसी क़ानून को मानवता से जोड़ने का प्रयास है।
✍दिलीप कुमार अधिवक्ता










Discussion about this post