भारतीय न्यायिक व्यवस्था में “तारीख पर तारीख” को मात्र न्याय में देरी कहकर टाल देना एक बौद्धिक छल है। यह साधारण देरी नहीं, बल्कि न्याय का धीमा, सुनियोजित और संस्थागत अपहरण है। मुकदमे वर्षों तक जीवित रखे जाते हैं, किंतु न्याय हर तारीख के साथ थोड़ा-थोड़ा दम तोड़ता जाता है। अंततः वादी को न्याय नहीं मिलता, उसे केवल न्यायालय द्वारा परोसी गई न्याय की लाश थमा दी जाती है।
मैं, डिस्प्यूट-ईटर, न्यायिक जागरूकता के लिए कार्यरत एक सेवक के रूप में यह स्पष्ट और निर्भीक रूप से कहना चाहता हूँ “तारीखें तब तक मिलती रहेंगी, जब तक आप सवाल नहीं करेंगे; और जिस दिन सवाल उठने लगेंगे, उसी दिन सोया हुआ इंसाफ़ जागने लगेगा।”
अब समय आ गया है कि आप जागें और अपने सरकार से यह सीधा, स्पष्ट और साहसिक प्रश्न पूछें, “मेरे केस में अंतिम बहस कब होगी?” इस एक प्रश्न की शक्ति को कम मत आँकिए। आपके द्वारा सरकार से पूछा गया यह अकेला सवाल न्यायिक व्यवस्था में सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। जब वादी सवाल करने लगेगा, तब व्यवस्था को जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
जिस दिन यह प्रश्न न्यायालयों की देहलीज़ पर गूंजेगा, उसी दिन तारीख पर तारीख की संस्कृति दरकने लगेगी। जिस दिन भारत के हर न्यायाधीश के मुख से यह स्पष्ट और निर्भीक वाक्य निकलने लगेगा, “आपके केस में बहस आज, और केवल आज ही होगी; कोई स्थगन नहीं दिया जाएगा।” उस दिन को स्मरण करिए। एक क्षण के लिए अपने मन की कल्पना में जाकर देखिए, न्यायालयों में भीड़ नहीं होगी, फ़ाइलों पर धूल नहीं जमी होगी, वादी की आँखों में थकान नहीं बल्कि भरोसा होगा। सोचिए, उस दिन भारत कितना बदला हुआ होगा। और जिस किसी भी न्यायाधीश में यह कहने का मानसिक साहस नहीं, वह अनजाने में देरी का संरक्षक और अन्याय का मौन साझेदार बन जाता है।
तीसरा और सबसे संवेदनशील पक्ष अधिवक्ताओं की भूमिका है। बार-बार नए आवेदन, अचानक अनुपस्थिति, “तैयारी नहीं है”, दस्तावेज़ों की कृत्रिम कमी या अनावश्यक तकनीकी आपत्तियाँ, ये सब कानूनी प्रक्रिया का उपयोग नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग हैं। जब बहस से जानबूझकर बचा जाता है और वाद को कृत्रिम रूप से पेचीदा बनाया जाता है, तो एक समय ऐसा आता है जब न्यायालय की भी रुचि समाप्त हो जाती है। तब मुकदमा न्याय की खोज नहीं, बल्कि केवल तारीख लेने की एक औपचारिक रस्म बनकर रह जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ देरी, देरी नहीं रहती; वह न्याय की संस्थागत हिंसा में बदल जाती है।
सत्य यही है कि न्याय वही है जो समय पर हो। जो न्याय समय से पहले नहीं मिला, और जो न्याय समय बीत जाने के बाद दिया गया। वह न्याय नहीं होता। वह केवल न्याय की लाश होती है। न्याय की आत्मा समय में बसती है। समय के बाहर दिया गया फैसला, चाहे कितना ही विधिसम्मत क्यों न हो, पीड़ित के जीवन में अपना अर्थ खो देता है।
✍डिस्प्यूट-ईटर।










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