राहुल (काल्पनिक नाम) मेरे सामने बैठा था। उसकी आँखों में न ग़ुस्सा था, न घृणा, बस एक थका हुआ विश्वास और भीतर तक टूटा हुआ मन। वह अपनी पत्नी के बारे में बता रहा था, जो अत्यंत पढ़ी-लिखी और आधुनिक सोच वाली महिला है। समस्या यह नहीं थी कि वह शिक्षित है, बल्कि यह थी कि वह पति के साथ नहीं रह रही थी। वह किसी और के साथ रह रही थी, लेकिन भरण-पोषण उसी पति से चाहती थी।
राहुल न्यायालय में अपनी पत्नी के अवैध संबंध को सिद्ध नहीं कर पा रहा था। क़ानूनी जटिलताओं के बीच वह असहाय होकर मुझसे बस यही पूछ रहा था, “अब मैं क्या करूँ?” उसकी बात सुनकर एक क्षण को मुझे स्वयं पर और अपने समाज पर विश्वास नहीं हुआ। मेरे मुँह से अनायास निकल पड़ा, यह कैसा समाज बन रहा है और हम अपनी बेटियों को कैसी शिक्षा दे रहे हैं?
राहुल की आवाज़ में न कोई आरोप था, न बदले की भावना, बस एक टूटी हुई स्वीकृति थी। स्थिति को स्पष्ट करने के लिए मैंने दिसंबर 2025 में पत्नी के अधिवक्ता से बातचीत की। बातचीत बहुत सहज ढंग से समाप्त कर दी गई, यह कहकर कि लड़का अपनी पत्नी को रखना ही नहीं चाहता।
जब यह कथन पत्नी के पिता तक पहुँचाया गया, तो पिता ने कहा कि उनकी बेटी पति के पास जाएगी, लेकिन मार्च 2026 के बाद। मैंने तुरंत राहुल का नंबर दिया और आग्रह किया कि पत्नी सीधे पति से बात करे, क्योंकि रिश्ते बातचीत से सुलझते हैं, नोटिस और मुकदमों से नहीं। सहमति तो जताई गई, लेकिन न उस दिन और न ही अगले दिन कोई संपर्क किया गया।
कुछ दिनों बाद मैंने स्वयं फोन कर पत्नी से बात करने के लिए नंबर माँगा, लेकिन वह भी देने से मना कर दिया गया। जब मैंने इतने लंबे इंतज़ार पर आपत्ति जताई, तो जवाब मिला, “जनवरी तक का समय दे दीजिए।” यह सोचकर मैंने प्रतीक्षा की कि शायद कोई पारिवारिक या सामाजिक बाधा होगी।
लेकिन खरमास समाप्त होने के बाद जब पुनः संपर्क किया गया, तो जो उत्तर मिला, उसने भीतर तक झकझोर दिया। पत्नी के अधिवक्ता ने साफ शब्दों में कहा, “अगर शांति से रहना है, तो पैसा देकर संबंध तोड़ लीजिए।”
उसी क्षण यह स्पष्ट हो गया कि यह विवाह नहीं, बल्कि वसूली की एक सुनियोजित प्रक्रिया बन चुकी है। यह वह विकृत प्रवृत्ति है, जहाँ पढ़ी-लिखी महिला विवाह को पवित्र संबंध नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक सौदे के रूप में देखने लगती है। जहाँ साथ किसी और का होता है, पहचान पति की बनी रहती है और जिम्मेदारी केवल क़ानून की धाराओं तक सीमित हो जाती है।
यह कहानी केवल राहुल की नहीं है। यह उस सामाजिक बीमारी की कहानी है, जहाँ कुछ मामलों में विवाह प्रेम, विश्वास और समर्पण का बंधन न रहकर आजीवन भरण-पोषण का लाइसेंस बनता जा रहा है। क़ानून भरण-पोषण का अधिकार देता है, लेकिन नैतिकता नहीं सिखाता। क़ानून सुरक्षा के लिए है, न कि अन्याय और शोषण को वैध बनाने के लिए।
सबसे दुखद यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में विवाह नाम की संस्था हर दिन थोड़ी-थोड़ी करके कमजोर होती जा रही है।
असल प्रश्न नारी शिक्षा का विरोध नहीं है, बल्कि शिक्षा के स्वरूप पर है। क्या शिक्षा का अर्थ केवल अधिकार, स्वतंत्रता और आर्थिक सुरक्षा तक सीमित रह गया है? क्या उसमें जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और रिश्तों को निभाने का संस्कार शामिल नहीं होना चाहिए?
यदि शिक्षा का परिणाम यह हो कि विवाह बोझ लगे, पति केवल आय का स्रोत बने और क़ानून को कमाई का साधन बना लिया जाए, तो यह केवल अदालतों की समस्या नहीं है। यह समाज के चरित्र और मूल्यों का गहरा संकट है, एक ऐसा संकट, जो विवाह जैसी आधारभूत संस्था को भीतर से खोखला कर रहा है।
जब पढ़ी-लिखी महिला पैसा लेकर विवाह तोड़ने को ही समाधान मानने लगे, तब प्रश्न केवल पति-पत्नी का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे समाज की नैतिक दिशा पर खड़ा हो जाता है। यही वह सच्चाई है, जिसे आज कठोरता से देखने और स्वीकार करने की आवश्यकता है।
✍ दिलीप कुमार (अधिवक्ता)










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