“मम्मी, क्या यही मेरे पापा हैं?” यह कोई साधारण प्रश्न नहीं था। यह उस बच्ची की आत्मा से निकली हुई एक करुण आवाज थी, जो परिवार न्यायालय, की दीवारों से टकराकर पूरे न्यायिक परिसर को स्तब्ध कर गई। ग्यारह वर्ष की वह बच्ची, जिसकी आँखों में अब तक सपने होने चाहिए थे, आज पहचान ढूँढ रही थी। जिन आँखों को पिता की छाया में सुरक्षा महसूस करनी थी, वही आँखें अनजान चेहरों में अपने जन्मदाता को तलाश रही थीं। पति–पत्नी के बीच वर्षों से चले आ रहे विवाद ने उस बच्ची को इस कगार पर ला खड़ा किया था कि उसे अपने ही पिता की पहचान के लिए माँ का सहारा लेना पड़ रहा था। यह दृश्य किसी मुक़दमे का मात्र हिस्सा नहीं था, बल्कि उस समाज की सामूहिक चुप्पी का प्रमाण था, जो वैवाहिक संस्था को बचाने में असफल हो रहा है। बच्चे किसी वाद के पक्षकार नहीं होते, फिर भी सबसे कठोर दंड वही भुगतते हैं। पति–पत्नी का संघर्ष जब अदालत की चौखट पर पहुँचता है, तो कानून अपने तर्कों और धाराओं में उलझ जाता है, लेकिन बच्चे का मन उन सबसे परे केवल एक प्रश्न करता है, “मेरी गलती क्या है?”
जब पिता ने अदालत के समक्ष अपनी बेटी से मिलने के अधिकार की बात रखी, तब माननीय न्यायाधीश का उत्तर केवल कानूनी टिप्पणी नहीं था, बल्कि एक गहरी नैतिक चेतावनी थी-
“जिस बेटी को अपने पिता को पहचानने के लिए अपनी माँ की ओर देखना पड़े, वह अपने उत्तरदायित्व से पहले ही चूक चुका होता है। खैर, मिलन आपका कानूनी अधिकार है। मैं आपको आज शाम चार बजे तक बेटी को अपने साथ रखने की अनुमति देता हूँ।”
बेटी अपने पिता के पास आकर बैठ गई। न कोई डर था, न शिकायत, बस एक अनकही उम्मीद। उसने पिता का हाथ थामा। वह हाथ जो कभी उसे स्कूल छोड़ने नहीं ले गया, वह हाथ जो परीक्षा के दिन उसके सिर पर आशीर्वाद बनकर नहीं रखा गया, वह हाथ जो बुख़ार में उसके माथे पर दर्द कम करने के लिए नहीं फेरा गया। यह वही हाथ था जिसने कभी उसकी उँगली पकड़कर उसे सड़क पार करना नहीं सिखाया, जिसने कभी गिरने पर उसे उठाकर सीने से नहीं लगाया। आज वह हाथ उसके पास था, लेकिन वर्षों की दूरी ने उसे भावनात्मक रूप से ठंडा कर दिया था। फिर भी बेटी उसे थामे बैठी थी, मानो बीते हुए समय को पकड़ लेना चाहती हो।
उसकी नज़र बार-बार पिता की कलाई पर जा रही थी। वहाँ बँधी एक महँगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, मानो समय को नहीं, उस बच्ची के छूटते बचपन को गिन रही हो। फिर उसकी आँखें पिता की जेब की ओर गईं। वहाँ रखी एक कलम पर। बच्ची उसे बार-बार निहार रही थी। पिता ने सहज स्वर में पूछा “क्या तुम्हें यह कलम चाहिए?”
बच्ची ने सिर हिलाया और बोली, “नहीं, मुझे यह कलम नहीं चाहिए। पिता ने पूछा क्यूँ? बेटी ने जवाब दिया, माँ ने बताया है कि आज आप दोनों का पति-पत्नी के रूप में आख़िरी दिन साथ हैं। यह वही कलम है, जिसके द्वारा लंबे-लंबे आवेदन में एक दूसरे पर निराधार आरोप लिखकर आप दोनों आज अलग हो रहे हैं।” मुझे नहीं चाहिए ऐसी कलम! फिर उसने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “मुझे मेरा पापा चाहिए।” कमरा सन्न रह गया।
बच्ची ने एक मासूम समाधान बताया वह किसी अदालत के लिए नहीं, सीधे इंसान के दिल के लिए था, “मुझे वैसा पापा चाहिए, जो मेरी माँ के साथ रहे।” उसकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी, केवल एक मासूम समाधान था, रिश्ते तोड़े नहीं जाते, बस साथ रहकर बचा लिए जाते हों।
कुछ पल रुककर उसने फिर पूछा “आप लोग एक साथ क्यों नहीं रहते?” यह प्रश्न किसी जिरह का हिस्सा नहीं था। यह उस बच्ची का प्रश्न था, जो अब भी मानती थी कि बड़े लोग हर समस्या का हल जानते हैं। लेकिन इस बार पिता के पास कोई उत्तर नहीं था। वह चुप रहा। उसकी चुप्पी उस बच्ची के हर प्रश्न से कहीं अधिक भारी थी। बच्ची के सवाल पिता के भीतर तीर की तरह चुभ रहे थे, बिना खून के, लेकिन गहरे। अब वह पिता बात नहीं करना चाहता था। वह उस आईने से भागना चाहता था, जो उसकी बेटी की आँखों में उसे दिखा रहा था, एक अनुपस्थित पिता के रूप में।
बच्ची का हारता हुआ बचपन अब भी उसका हाथ थामे बैठी थी। उसे नहीं पता था कि वह जिस हाथ को थामे है, वह हाथ नहीं, एक टूटे हुए रिश्ते की आख़िरी कड़ी है। वह न घड़ी चाहती थी, न कलम। उसे तो बस एक साथ बैठे हुए, माँ और पिता चाहिए थे, इतनी छोटी-सी माँग, और इतनी बड़ी सच्चाई। कभी-कभी बच्चे हमसे कुछ नहीं माँगते, वे बस हमें हमारी ज़िम्मेदारी याद दिलाते हैं। और जब कोई बच्ची अपने पिता की चुप्पी के सामने खुद हार मान ले, तो समझ लीजिए, मुक़दमा चाहे जो जीते, हार हमेशा बचपन की होती है।
उस बच्ची को यह पता नहीं था कि उसके लिए पिता अब एक रिश्ता नहीं, बल्कि ऐसा इंसान बन चुका था जो किसी और के प्रेमजाल में उलझकर अपने ही परिवार को भूल चुका था। वह न किसी के पक्ष में थी, न किसी के विरोध में। उसे केवल वह प्रेम चाहिए था जो बिना शर्त होता है, बिना शपथपत्र के।
माँ-पिता के आरोप-प्रत्यारोप में उसका बचपन चुपचाप कुचला जा रहा था। हर तारीख और हर बहस उसके मन पर एक नई चोट छोड़ जाती थी। बाहर से वह हँसती-पढ़ती जरूर दिखती थी, पर भीतर एक ऐसा खालीपन था जिसे कोई आदेश या डिक्री कभी नहीं भर सकती।
यह बच्ची हमें याद दिलाती है कि विवाह टूट सकता है, पर माता-पिता का कर्तव्य नहीं। कानून भरण-पोषण और मुलाक़ात तय कर सकता है, लेकिन पिता की पहचान, माँ की ममता और बच्चे का आत्मसम्मान नहीं। इसलिए जब भी अहं की लड़ाई हो, उस प्रश्न को याद रखिए “मम्मी, क्या यही मेरे पापा हैं?” क्योंकि मुक़दमा चाहे जो जीते, हार हमेशा बचपन की होती है।
✍दिलीप कुमार अधिवक्ता।











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