पति काफी हंसमुख था और पत्नी कुछ अधिक सांवली थी। पति को गुनगुनाने की आदत थी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि गुनगुनाने की उसकी यह आदत शादी के केवल दो महीने के भीतर ही समस्या बन जाएगी। शादी के बाद पहली बार जब दोनों मिले, तो पति शांत होकर अपनी पत्नी का चेहरा निहारता रह गया। उस समय पत्नी ने कहा, “क्या सोच रहे हो? यही न कि पत्नी काली मिल गई है?” पति ने जवाब दिया, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। रंग में क्या रखा है?” उस समय से पत्नी के मन में यह गलतफहमी बैठ गई कि पति उसके काले रंग से काफी असंतुष्ट है। इस प्रकार, शादी के दो महीने बीत गए।
पति हमेशा पत्नी से पहले बिछावन छोड़ता था। सब कुछ सामान्य चल रहा था। एक दिन सोने से पहले पत्नी ने फ्रीज का डिफ्रॉस्ट बटन दबा दिया। पति सोकर उठा और देखा कि फर्श पर पानी फैला हुआ है। उसने सोचा कि पत्नी के जागने से पहले पानी को पोंछ देना चाहिए, क्योंकि फर्श चिकना था और उस पर पत्नी फिसल सकती थी। पति ने वाइपर उठाया और फर्श पर फैले पानी को पोंछते हुए बाथरूम की ओर ले गया। बाथरूम का फर्श बिल्कुल सफेद था। फ्रीज के पास का पानी वाइपर से पोंछने के बाद जब बाथरूम के सफेद फर्श पर गिरा, तो गंदगी के कारण फ्रीज से निकला साफ पानी कालापानी में बदल चुका था। पति ने वाइपर सही जगह पर रखा और गुनगुनाया, “मेरे घर में है कालापानी।” वह यही गुनगुनाते हुए बेडरूम की ओर गया।
पत्नी ने पति की गुनगुनाहट सुन ली। वह उठी और बोली, “माना कि मैं काली हूं, लेकिन तुम्हारे मुंह से निकला यह शब्द मुझे बहुत पीड़ा पहुंचा रहा है। तुम मुझे इस तरह अपमानित करने का हक नहीं रखते।” पति के लाख समझाने के बावजूद पत्नी नहीं समझी और मामला डिस्प्यूट-ईटर के पास पहुंच गया।
डिस्प्यूट-ईटर ने नवदंपती को अपने कार्यालय में बुलाया। नियत समय पर दोनों कार्यालय में उपस्थित हुए। दोनों ने बारी-बारी से अपना पक्ष डिस्प्यूट-ईटर के समक्ष रखा।
डिस्प्यूट-ईटर ने दोनों पक्षों को समझाया कि आप दोनों अपने मन को शक या धारणा का कारख़ाना नहीं बनने दें। यदि आपका मन शक या धारणा का कारख़ाना बन जाएगा, तो आप अपने परिवार को टूटने से नहीं बचा सकते। आपके मन से शक या धारणा को बाहर निकालने के लिए पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति समर्पण जरूरी है। दोनों संतुष्ट होकर अपने घर वापस चले गए।
✍डिस्प्यूट-ईटर










