हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कुल 16 संस्कार है, जिसमे प्रथम संस्कार गर्भाधान संस्कार है। गर्भाधान संस्कार द्वारा सृष्टि में जीवन की प्रक्रिया आरंभ होती है। धार्मिक रूप से गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य और प्रथम कर्तव्य ही संतानोत्पत्ति माना गया है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 20 उपरोक्त मान्यताओं को स्वीकार करता है और गर्भ में आये बच्चे अर्थात अजन्मा को भी संपत्ति में जन्मा के बराबर हक देता है। शर्त केवल इतना ही है कि अजन्मा को यह हक पूर्ण रूप से प्राप्त तब होता है, जब वह पृथ्वी पर आकर साँस लेता है। यदि वह मृत पैदा लेता है तब यह प्रावधान लागू नहीं होता है। विधि की यह ऊपधारणा है कि संपत्ति एक पल के लिए भी स्वामी विहीन नहीं होती है।
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में वर्ष 2005 में महत्वपूर्ण संशोधन हुआ है। अधिनियम की धारा 06 के अनुसार बेटा और बेटी का हिस्सा बराबर हो गया है। इस धारा में एक और महत्वपूर्ण संशोधन किया गया है जिसके अनुसार मिताक्षरा विधि द्वारा शासित संयुक्त हिन्दू परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु पर विधि यह मानकर चलती है कि मृतक अपनी मृत्यु से पहले संयुक्त हिन्दू परिवार से अपना हिस्सा निकालने के बाद अपना प्राण त्यागा था। अतः विधि की भाषा में नवजात की मृत्यु होने पर भी विधि की उपधारणा होगी कि नवजात चाहे कुछ पल या घंटा ही जीवित क्यों न रहा हो,मृत्यु से पहले उसने अपनी संपत्ति का विभाजन कर लिया, तत्पश्चात उसकी मृत्यु हुई है। अब प्रश्न यह पैदा लेता है कि उस नवजात-मृतक की संपत्ति का उत्तराधिकारी कौन होगा?
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में दो प्रकार के उत्तराधिकारी है, जिसका वर्णन वर्ग – 01 और वर्ग – 02 में किया गया है। वर्ग – 01 में के उत्तराधिकारी के नहीं रहने पर ही वर्ग – 02 के उत्तराधिकारी को संपत्ति प्राप्त करने के अधिकार होता है। वर्ग 01 के उत्तराधिकारी में पुत्र, पुत्री, विधवा, माता और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र इत्यादि आते है। पिता, भाई, बहन वर्ग – 02 के उत्तराधिकारी होते है। चूंकि माँ वर्ग-01 की उत्तराधिकारी है, जबकि पिता और भाई वर्ग-02 के उत्तराधिकारी है। अतः नवजात-मृतक चाहे वह लड़का हो या लड़की उसके/उसकी संपत्ति की उत्तराधिकारी केवल और केवल माँ ही होगी।
✍दिलीप कुमार
अधिवक्ता
Full Stop No. 12/2026 (Criminal Dispute)
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