परिवाद (Complaint Case) में अब “अग्रिम जमानत” की जरूरत नहीं — सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला।
बिहार और झारखंड में Complaint Case से जुड़े मामलों में लंबे समय से एक गलत न्यायिक परंपरा चली आ रही थी। इसके तहत, जब किसी व्यक्ति के खिलाफ परिवाद वाद में अदालत द्वारा समन (नोटिस) जारी किया जाता था, तो वह सीधे अदालत में उपस्थित होने के बजाय पहले जमानत लेने के लिए सत्र न्यायालय और उसके बाद उच्च न्यायालय तक का चक्कर लगाता था।
ऐसा ही एक मामला जब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहुँचा, तो न्यायालय ने इस गलत परंपरा को सदा के लिए समाप्त करने का आदेश दे दिया। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश की प्रति पटना उच्च न्यायालय और झारखंड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को भेजते हुए निर्देश दिया कि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत कर सभी अधीनस्थ न्यायालयों में समुचित रूप से प्रसारित किया जाए।
अब यह स्थिति बदल गई है।
क्या बदला है?
23 अप्रैल 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने (SLP (Cr.) 16221/2025) में साफ कर दिया कि: –
👉 सिर्फ समन मिलने पर आरोपी को जमानत लेने की कोई जरूरत नहीं है।
👉 वह सीधे अदालत में खुद या अपने वकील के जरिए पेश हो सकता है।
आसान भाषा में समझिए–
- जैसे सिविल केस में नोटिस मिलने पर व्यक्ति सीधे या वकील के जरिए पेश हो जाता है,
- वैसे ही अब Complaint Case में भी होगा।
- हर बार जमानत लेना जरूरी नहीं है।
पहले क्या होता था?
- लोग समन मिलते ही घबरा जाते थे।
- सत्र न्यायालय या हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन देते थे और जमानत नहीं मिलने पर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाते थे।
- इसमें समय, पैसा और मेहनत—तीनों खर्च होते थे।
अब क्या करना है?
👉 सीधे अदालत में पेश हो जाइए। अदालत आपको जेल नहीं भेज सकेंगी।
👉 जमानत लेने की दौड़ लगाने की जरूरत नहीं है।
कोर्ट ने क्या-क्या साफ कहा?
- परिवाद वाद में पुलिस की सीधी भूमिका नहीं होती।
- बिना वारंट (NBW) के पुलिस गिरफ्तारी नहीं कर सकती।
- सिर्फ समन मिलने पर जमानत लेने की जरूरत नहीं है।
वारंट कब जारी होगा?
अदालत ने कहा कि वारंट तभी जारी होगा जब—
- आरोपी के भागने की संभावना हो, या
- समन मिलने के बाद भी वह जानबूझकर पेश न हो।
अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि इस स्थिति में जमानत की जरूरत ही नहीं है।
जमीनी अनुभव (उदाहरण के साथ)
एक अधिवक्ता के रूप में मेरा अपना अनुभव भी इसी मुद्दे से जुड़ा रहा है।
- परिवाद संख्या 3141/2005 में दिनांक 10.08.2011 को माननीय न्यायिक दंडाधिकारी श्री मिथिलेश कुमार ने इस प्रकार के आवेदन को स्वीकार किया था। आज वे मुजफ्फरपुर में जिला न्यायाधीश (इक्साइज) के पद पर कार्यरत हैं।
लेकिन इसके बाद कई मामलों में अलग रुख देखने को मिला—
- Complaint Case No. 660/2011 (विश्वनाथ मिश्र बनाम ललन ठाकुर) में वर्ष 2014 में तत्कालीन न्यायिक दंडाधिकारी, मुजफ्फरपुर (श्रीमती मौसमी सिंह) ने वाद को खारिज कर दिया।
- Complaint Case No. 2713/2016 (गौतम पाण्डेय बनाम डॉ. विनायक गौतम) में दिनांक 23.08.2017 को आवेदन खारिज कर दिया गया।
इसके खिलाफ क्रिमिनल रिवीजन संख्या 180/2017 दायर किया गया, लेकिन उसे भी 25.07.2018 को तत्कालीन ADJ-07, (अनामिका टी) मुजफ्फरपुर द्वारा खारिज कर दिया गया।
इसके बाद अक्सर अदालतों में यह कहा जाने लगा
👉 “जमानत लेकर ही आइए”
👉 “ऐसे आवेदन से अदालत का समय बर्बाद होता है” इसी कारण मुझे भी ऐसे आवेदन देना बंद करना पड़ा।
अब इस फैसले से क्या फायदा होगा?
.बेवजह जमानत के लिए भाग-दौड़ खत्म होगी
.लोगों का समय और पैसा बचेगा
.अदालतों का काम आसान होगा
.प्रक्रिया ज्यादा सरल और समझने योग्य बनेगी
यह फैसला सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि आम लोगों को राहत देने वाला बड़ा कदम है।
अब Complaint Case में फंसने पर
👉 घबराने की जरूरत नहीं
👉 जमानत के लिए भागने की जरूरत नहीं
👉 बस सम्मन का पालन करें और अदालत में पेश हो जाएं
दिलीप कुमार, अधिवक्ता









