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समान धर्मावलम्बी और भिन्न-भिन्न धर्मावलम्बी की शादी और भारतीय कानून – एक नजर में।

Adv. Dilip Kumar by Adv. Dilip Kumar
August 30, 2024
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समान धर्मावलम्बी और भिन्न-भिन्न धर्मावलम्बी की शादी और भारतीय कानून – एक नजर में।
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शादी एक सामाजिक, धार्मिक और कानूनी संस्था है जो दो विषम लिंगियों के बीच एक स्थायी और मान्यता प्राप्त संबंध स्थापित करती है। यह संबंध अक्सर जीवनभर के लिए होता है और इसमें विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक दायित्व शामिल होते हैं।

शादी का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि वह किसी के लिए भी वर्जित नहीं है, हाँ, कुछ शर्तें जरूर होती हैं, जैसे उम्र, धर्म इत्यादि। भारत में शादी से जुड़े हुए अनेक कानून हैं। आज के समय में जाति और धर्म का बंधन भी टूटता जा रहा है। पारंपरिक रीति-रिवाजों से शादी करना आज के समय में आवश्यक नहीं रह गया है।

  1. हिंदू विवाह अधिनियम 1955:- भारत में शादी को नियंत्रित करने के लिए कई कानून हैं। प्रत्येक धर्मावलंबी के लिए अपने व्यक्तिगत कानून हैं। यदि शादी के दोनों पक्ष हिंदू हैं, तो उस पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधान लागू होते हैं। धारा 02 (1) “क” और धारा 05 हिन्दू विवाह अधिनियम 1955.
  2. मुस्लिम व्यक्तिगत कानून: – यदि विवाह के दोनों पक्ष मुस्लिम हैं, तो यह मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से नियंत्रित होता है।
  3. क्रिश्चियन विवाह अधिनियम 1872:- यदि दोनों पक्ष क्रिश्चियन हैं और भारत के नागरिक है, तो यह क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872 से नियंत्रित होता है। इस अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि यदि कोई क्रिश्चियन किसी गैर क्रिश्चियन से शादी करना चाहता है तो उसकी भी शादी क्रिश्चियनरीति रिवाज से ही करनी होगी। यानि शादी का एक पक्ष भी क्रिश्चन है तो यह अधिनियम के अनुसार शादी कर सकते है। धारा 04 क्रिश्चियन विवाह अधिनियम 1872.
  4. पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936: – (Parsi Marriage and Divorce Act, 1936):- यह कानून पारसी समुदाय के विवाह और तलाक से संबंधित है।यदि एक हिंदू और एक मुस्लिम या दो भिन्न धर्मावलंबी शादी के बंधन में बंधना चाहते हैं और धार्मिक रीति से शादी करना चाहते हैं, तो इनमें से किसी एक को अपना धर्म त्यागकर अपने होने वाले पति या पत्नी का धर्म स्वीकार करना होगा। तभी वे पारंपरिक रीति-रिवाज से शादी कर सकते हैं।हालांकि, यदि दो भिन्न धर्मावलंबी शादी के बंधन में बंधना चाहते हैं और अपने धर्म को बदलना नहीं चाहते, तो उन्हें विशेष विवाह अधिनियम, 1954 या विदेश विवाह अधिनियम, 1969 के तहत शादी करनी होगी। इन अधिनियमों के तहत शादी करने पर दोनों पक्षों को अपने धर्म को बनाए रखते हुए वैध शादी के बंधन में बंधा जा सकता है।
  5. विशेष विवाह अधिनियम 1954: – भारतीय कानून के तहत दो विपरीत लिंगी, जो विभिन्न धर्मों के अनुयायी हैं, वैध शादी के बंधन में बंध सकते हैं और उन्हें अपने धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार की शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत की जा सकती है। इस प्रकार की शादी वैध मानी जाती है और दंपत्ति को अपने धर्म को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती। धारा 04 विशेष विवाह अधिनियम।
  6. विदेश विवाह अधिनियम, 1969: – यदि विभिन्न धर्मों के अनुयायी, जिनमें से कम से कम एक व्यक्ति भारतीय है, भारत से बाहर किसी विदेशी से शादी करना चाहते हैं, तो वे विदेश विवाह अधिनियम, 1969 के प्रावधानों के तहत ऐसा कर सकते हैं। इस अधिनियम के तहत, भारतीय नागरिकों को विदेश में विवाह करने की अनुमति प्रदान की जाती है, जिससे वे विदेश में रहने वाले किसी व्यक्ति से शादी कर सकते हैं, जबकि उनके धार्मिक विश्वासों को बनाए रख सकते हैं। धारा 04 विदेश विवाह अधिनियम।

 इन दोनों कानूनों के तहत, भिन्न धर्मावलंबियों को शादी के समय धर्म परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती और वे अपने धर्मों को बनाए रखते हुए वैध शादी कर सकते हैं।

✍ दिलीप कुमार
संपत्ति और परिवार के वकील

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