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“मेरे पास पैसा थोड़ा कम है।”

Adv. Dilip Kumar by Adv. Dilip Kumar
February 6, 2026
in Latest Articles
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“मेरे पास पैसा थोड़ा कम है।”
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भारतीय समाज में वैवाहिक विवादों को प्रायः “कानूनी समस्या” के रूप में देखा जाता है, जबकि उनके बीज अधिकतर सामाजिक-मानसिक और आर्थिक परिस्थितियों में छिपे होते हैं। अदालतों में लंबित वैवाहिक मुकदमों का अध्ययन बताता है कि अधिकांश मामलों में विवाद का कोई ठोस कारण नहीं होता, न अत्याचार, न धोखा, बल्कि असुरक्षा, अभाव और संवादहीनता ही झगड़े को जन्म देती है।

यह कथा एक ऐसे युवक की है, जो स्नातक का छात्र था, मात्र 20–21 वर्ष की उम्र में घर छोड़ने को मजबूर हुआ। जेब में तीन रुपये पचास पैसे, पैरों में हवाई चप्पल और जीवन में केवल संघर्ष। भूख, ठंड और अपमान को सहते हुए उसने जीवन खड़ा किया। ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई पूरी की, और आठ वर्ष बाद विवाह किया। उसकी मासिक आय 400–500 रुपये थी, पर आत्मसम्मान उससे कहीं बड़ा।

यही आत्मसम्मान वैवाहिक जीवन में सबसे अधिक आहत हुआ। आर्थिक अभाव वास्तविक था, पर “गरीब” कहे जाने की पीड़ा उससे कहीं अधिक गहरी। भारतीय समाज में गरीबी को केवल स्थिति नहीं, व्यक्ति की पहचान बना दिया जाता है। जब पत्नी द्वारा अनजाने में कहा गया, “पैसा है ही नहीं” तो वह वाक्य उसके वर्षों के संघर्ष को नकारने जैसा लगा। यहीं से विवाद शुरू हुआ।

कानूनी दृष्टि से देखें तो ऐसे विवाद क्रूरता या उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आते, पर यही छोटे-छोटे टकराव धीरे-धीरे बड़े मुकदमों में बदल जाते हैं, धारा 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम, तलाक़ के वाद। अदालत में पहुँचने के बाद, वही दंपति यह तक याद नहीं कर पाते कि झगड़ा शुरू किस बात पर हुआ था।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि, अधिकांश वैवाहिक विवाद, असहमति से शुरू होते हैं, असमझी प्रतिक्रिया से गहरे होते हैं, और संवाद के अभाव में कानूनी रूप ले लेते हैं।

इस कथा के दंपति ने अदालत का रास्ता चुनने से पहले संवाद को चुना। उन्होंने शांति से बैठकर विवाद का कारण खोजा, पर कोई कारण मिला ही नहीं। तब उन्होंने एक व्यावहारिक समझौता किया, साथ बैठना, भोजन न छोड़ना, निकटता से इंकार न करना। यह कोई कानूनी अनुबंध नहीं था, बल्कि मानवीय समझदारी थी।

यही वह बिंदु है, जहाँ कानून को अंतिम उपाय होना चाहिए, पहला नहीं। एक अधिवक्ता के रूप में मेरा अनुभव कहता है, यदि पति-पत्नी प्रारंभिक चरण में संवाद, समझौते और सम्मान को अपनाएँ, तो 70–80% वैवाहिक मुकदमे अदालत तक पहुँचेंगे ही नहीं।

नवविवाहित दंपतियों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि उनके जीवन में कभी विवाद नहीं होगा। विवाद होगा, पर उसे कैसे संभालना है, यही रिश्ते की परीक्षा है। आपके पास तीन ही रास्ते होते हैं, या जीवनसाथी को अपने अनुसार ढालें, या स्वयं को उसके अनुसार ढालें, या फिर, समझौता करें। और यही समझौता न केवल रिश्तों को, बल्कि समाज और न्यायालय, दोनों को अनावश्यक बोझ से बचाता है।

✍ दिलीप कुमार
अधिवक्ता

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