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विवादों का धोबी: डिस्प्यूट-ईटर।

जहाँ झगड़े धुलते हैं और रिश्ते फिर से साफ हो जाते हैं।

Adv. Dilip Kumar by Adv. Dilip Kumar
March 7, 2026
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विवादों का धोबी: डिस्प्यूट-ईटर।
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विवादों का धोबी: डिस्प्यूट-ईटर

जहाँ झगड़े धुलते हैं और रिश्ते फिर से साफ हो जाते हैं।

एक बार की बात है। एक छोटे से गाँव में हरिया नाम का एक धोबी रहता था। उसकी मेहनत, सादगी और ईमानदारी के कारण पूरा गाँव उसका सम्मान करता था।

एक दिन उस गाँव में एक साधु आए। उनसे मिलने बहुत से लोग गए, जिनमें हरिया भी था। लोगों ने आशीर्वाद लिया। साधु ने सभी से अपना-अपना परिचय देने को कहा। सभी ने परिचय दिया।

जब हरिया की बारी आई, तब उसने अपने अनोखे अंदाज़ में कहा “महाराज, मेरा नाम हरिया है। मैं साधारण धोबी हूँ। साथ ही साथ मैं भगवान का सगा भाई भी हूँ।

“भगवान का भाई? यह कैसे?”  लोग चौंक गए। हरिया शांत स्वर में बोला
“क्योंकि भगवान भी एक प्रकार से धोबी हैं। भगवान मनुष्य के भीतर की गंदगी धोते हैं और मैं मनुष्य के बाहर की गंदगी धोता हूँ। हम दोनों का काम एक ही है शुद्ध करना। इसलिए काम के नाते हम दोनों भाई हुए।” लोग प्रभावित हुए, पर हरिया यहीं नहीं रुका। उसने आगे कहा
“कुछ बातों में तो मैं भगवान से भी बड़ा हूँ।” सबने आश्चर्य से पूछा “वह कैसे?” हरिया बोला “भगवान उसी के भीतर की गंदगी साफ करते हैं, जो उनके पास जाता है, प्रार्थना करता है। लेकिन मैं तो घर-घर जाता हूँ। गंदगी के पास स्वयं पहुँचता हूँ, गंदगी एकत्र करता हूँ और जहाँ से गंदगी लाता हूँ वहाँ सफाई लौटाता हूँ।” साधु मुस्कुराए और बोले “सत्य है, सफाई ही ईश्वर का दूसरा रूप है।”

जिस प्रकार भगवान और धोबी का संबंध है, उसी प्रकार न्यायालय और डिस्प्यूट-ईटर का संबंध है। डिस्प्यूट-ईटर और न्यायालय मानो एक ही उद्देश्य से जुड़े दो भाई हैं।

न्यायाधीश दिन-रात परिश्रम करते हैं, फिर भी मुकदमों का बोझ कम नहीं होता। अदालतों में विवादों, झगड़ों और वर्षों की दुश्मनी की परतें जमा होती चली जाती हैं। ऐसे समय में डिस्प्यूट-ईटर आगे आता है और कई मामलों में न्यायालय से पहले तथा अधिक प्रभावी भूमिका निभाता है।

न्यायालय उसी की पीड़ा दूर करता है जो उसके दरवाज़े तक पहुँचता है, परंतु डिस्प्यूट-ईटर स्वयं पीड़ित के पास पहुँचकर उसकी पीड़ा को जड़ से मिटाने का प्रयास करता है।

न्यायालय की प्रक्रिया औपचारिक, समयबद्ध और शुल्क-आधारित होती है, जबकि डिस्प्यूट-ईटर सेवा-भाव से निःशुल्क कार्य करता है। हाँ, इसके संचालन में व्यय अवश्य होता है, इसलिए जिसकी पीड़ा दूर हो जाती है, वह अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जो अर्पित करता है, डिस्प्यूट-ईटर उसी में संतोष मानता है।

पारिवारिक विवाद हो, संपत्ति का झगड़ा हो या समझौता-योग्य आपराधिक मामला, वह सभी को अलग-अलग सुनता है, फिर आमने-सामने बैठाकर संवाद कराता है, गलतफहमियाँ दूर करता है और अंततः ऐसा समाधान देता है जिसे दोनों पक्ष स्वीकार करें।

न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील हो सकती है। अपील में मंच बदल जाता है, पर विवाद समाप्त नहीं होता। परंतु डिस्प्यूट-ईटर का उद्देश्य विवाद को “पूर्ण विराम” दिलाना है, अर्थात वास्तविक अंत।

“डिस्प्यूट-ईटर आज सैकड़ों विवादों पर Full-Stop लगाकर न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ कम करने हेतु अपने स्तर से सतत प्रयास कर रहा है।”

✍दिलीप कुमार अधिवक्ता

 

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