न्यायिक सुधार की दिशा में व्यावहारिक पहल।
भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों में से एक है। न्यायपालिका पर जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। किंतु आज यह भी एक यथार्थ है कि देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया कई बार अत्यधिक जटिल, धीमी और महंगी हो जाती है।
न्यायिक सुधार पर अक्सर बड़े और जटिल प्रस्तावों की चर्चा होती है, किंतु वास्तविकता यह है कि न्यायिक प्रक्रिया में कुछ छोटे और व्यावहारिक सुधार भी न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तीव्र और भरोसेमंद बना सकते हैं। इसी संदर्भ में न्यायिक कार्यप्रणाली के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर सुधार की आवश्यकता महसूस की जाती है।
नोटिस सेवा की प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक का उपयोग।
किसी भी मुकदमे की शुरुआत में नोटिस सेवा एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण होता है। परंतु व्यवहार में देखा जाता है कि नोटिस की तामिला को लेकर अनेक विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे मुकदमों में अनावश्यक विलंब होता है।
यदि नोटिस भेजने के लिए स्पीड पोस्ट या रजिस्टर्ड पोस्ट को अनिवार्य कर दिया जाए और भारतीय डाक विभाग की ट्रैक-कंसाइनमेंट रिपोर्ट को कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता दे दी जाए, तो नोटिस सेवा को लेकर होने वाले अधिकांश विवाद समाप्त हो सकते हैं।
इसी प्रकार, वर्तमान डिजिटल युग में यदि प्रतिवादी का ई-मेल उपलब्ध हो तो ई-मेल के माध्यम से नोटिस सेवा का भी वैधानिक प्रावधान किया जाना चाहिए। इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक तेज और प्रभावी हो सकेगी।
विरोधी पक्ष को दस्तावेजों की प्रतियाँ उपलब्ध कराने की अनिवार्यता।
वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में किसी पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों की केवल सूची विरोधी पक्ष को दी जाती है, जबकि वास्तविक दस्तावेजों की प्रतियाँ उपलब्ध नहीं कराई जातीं। इससे कई बार विरोधी पक्ष को दस्तावेजों की सही जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।
यदि यह व्यवस्था कर दी जाए कि वादी या प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक दस्तावेज की छाया प्रति स्वतः विरोधी पक्ष को उपलब्ध कराई जाए, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी और अनावश्यक विवाद भी समाप्त होंगे।
हाजिरी और समय आवेदन का पृथक प्रबंधन।
निचली अदालतों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में हाजिरी और समय आवेदन प्रस्तुत किए जाते हैं। इन सभी कागजातों को मूल अभिलेख में जोड़ देने से फाइल अत्यधिक मोटी हो जाती है और उसके रख-रखाव में कठिनाई उत्पन्न होती है।
इस समस्या का सरल समाधान यह हो सकता है कि हाजिरी और समय आवेदन के लिए अलग सहायक फाइल बनाई जाए और आदेश-पत्र में उसका उल्लेख कर दिया जाए। वर्ष के अंत में इन सहायक फाइलों को नष्ट किया जा सकता है। इससे न्यायिक अभिलेख अधिक व्यवस्थित रहेंगे।
मूल अभिलेख का सुव्यवस्थित प्रबंधन।
न्यायिक अभिलेखों के सुव्यवस्थित प्रबंधन के लिए यह आवश्यक है कि मूल फाइल में केवल महत्वपूर्ण दस्तावेज ही रखे जाएँ, जैसे—
- वाद-पत्र
- लिखित कथन
- संशोधन आवेदन
- स्थगनादेश (Injunction) आवेदन
- रिसीवर आवेदन
- सब्स्टीट्यूशन आवेदन
इस व्यवस्था से अभिलेख अनावश्यक रूप से मोटे नहीं होंगे और न्यायिक कार्य अधिक सुगम हो जाएगा।
अभिलेख प्रबंधन और प्रमाणित प्रति प्रदान करने की प्रणाली में सुधार।
न्यायालयों में प्रमाणित प्रति प्राप्त करने की प्रक्रिया कई बार अत्यधिक धीमी और जटिल होती है। यदि अभिलेखों के रख-रखाव और प्रमाणित प्रति निर्गमन की प्रक्रिया को पेशेवर और तकनीकी रूप से सक्षम एजेंसियों के माध्यम से संचालित किया जाए, तो इससे अभिलेखों का प्रबंधन अधिक सुव्यवस्थित होगा और प्रमाणित प्रतियाँ शीघ्र उपलब्ध हो सकेंगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता में व्यावहारिक संशोधन की आवश्यकता।
सिविल वादों में एक बड़ी समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी प्रतिवादी या उत्तरवादी की मृत्यु हो जाती है। उनके विधिक प्रतिनिधियों को प्रतिस्थापित करने में कई बार वर्षों लग जाते हैं।
इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान यह हो सकता है कि जब कोई प्रतिवादी पहली बार न्यायालय में उपस्थित हो या अपना लिखित कथन दाखिल करे, तब वह एक शपथ-पत्र प्रस्तुत करे जिसमें उसके सभी संभावित विधिक प्रतिनिधियों के नाम और पते दर्ज हों।
यदि ऐसा प्रावधान लागू हो जाए तो प्रतिवादी की मृत्यु के बाद विधिक प्रतिनिधियों को पुनः नोटिस भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और मुकदमों में होने वाला विलंब काफी हद तक कम हो जाएगा।
न्यायिक सुधार की दिशा में “डिस्प्यूट-ईटर” की पहल।
न्यायालयीन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और समयबद्ध बनाने के उद्देश्य से “डिस्प्यूट-ईटर” द्वारा समय-समय पर विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष न्यायिक सुधार संबंधी सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं। इन सुझावों के संबंध में किए गए पत्राचार का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है—
i. मुजफ्फरपुर में दो परिवार न्यायालयों के गठन का प्रस्ताव (2021)–
दिनांक 27.10.2021 को पत्रांक संख्या 02/2021 के माध्यम से डिस्प्यूट-ईटर द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय को मुजफ्फरपुर में दो परिवार न्यायालयों के गठन हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया। उक्त आवेदन के उपरांत पटना उच्च न्यायालय द्वारा स्थल चयन की प्रक्रिया प्रारंभ की गई और वर्तमान में मुजफ्फरपुर में परिवार न्यायालय भवन का निर्माण कार्य अपने अंतिम चरण में है।
ii.सिविल प्रक्रिया संहिता में संशोधन का प्रस्ताव (2023)
दिनांक 28.02.2023 को पत्रांक संख्या 01/2023 के माध्यम से डिस्प्यूट-ईटर द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय के निबंधक महोदय को पत्र लिखकर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में आवश्यक संशोधन करने का अनुरोध किया गया।
इसके पश्चात दिनांक 01.03.2023 को पत्रांक संख्या 02/2023 के माध्यम से मुजफ्फरपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के द्वारा उक्त प्रस्ताव को पुनः माननीय पटना उच्च न्यायालय को प्रेषित किया गया।
iii. भारत के राष्ट्रपति एवं सर्वोच्च न्यायालय को प्रस्ताव (2024)
दिनांक 20.12.2024 को पत्रांक संख्या 01/2024 के माध्यम से डिस्प्यूट-ईटर द्वारा भारत के माननीय राष्ट्रपति महोदय को पत्र लिखकर सिविल प्रक्रिया संहिता में संशोधन का अनुरोध किया गया।
इस पर दिनांक 07.02.2025 को राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा सूचित किया गया कि उक्त आवेदन को विचारार्थ भारत सरकार के गृह मंत्रालय को अग्रेषित कर दिया गया है।
iv. इसी क्रम में दिनांक 20.12.2024 को पत्रांक संख्या 02/2024 के माध्यम से भारत के सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय को भी उक्त प्रस्ताव भेजा गया, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय में Letter PIL No. 10398/SCI/PIL(E)/2025 के रूप में पंजीकरण किया गया।
v. साथ ही, दिनांक 20.12.2024 को पत्रांक संख्या 03/2024 के माध्यम से पटना उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय को भी न्यायिक सुधार संबंधी सुझाव प्रेषित किए गए।
vi. बिहार सरकार के विधि विभाग को सुझाव (2026)
दिनांक 27.02.2026 को डिस्प्यूट-ईटर द्वारा बिहार सरकार के विधि विभाग को पत्र लिखकर सिविल प्रक्रिया संहिता में आवश्यक संशोधन एवं न्यायालयीन प्रक्रिया में व्यावहारिक सुधार हेतु पुनः अनुरोध किया गया।
न्यायिक सुधार केवल कानून में बड़े और जटिल परिवर्तन से ही संभव नहीं होते। कई बार न्यायिक प्रक्रिया में छोटे किंतु व्यावहारिक सुधार ही न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनोन्मुख बना सकते हैं।
यदि ऐसे सुझावों पर गंभीरता से विचार करते हुए उन्हें चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, तो न्यायपालिका के प्रति जनता का विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो सकता है।
वास्तव में न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल निर्णय देना नहीं, बल्कि समय पर, निष्पक्ष और भरोसेमंद न्याय प्रदान करना है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए डिस्प्यूट-ईटर द्वारा प्रस्तुत सुझाव न्यायिक सुधार की दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखे जा सकते हैं।
✍🏿 दिलीप कुमार
अधिवक्ता, मुजफ्फरपुर
संस्थापक – डिस्प्यूट-ईटर









